प्राकृतिक होली के आयाम

 एक होली थोड़ी हटकर


कृत्रिम हानिकारक रंग से परे, तीव्र ध्वनि वाले संगीत से हटकर थोड़ा सा सोचने पर पूर्वजों के होली मनाने के आशय पर ध्यान देने पर बहुत सी शिक्षा मिलती है विशेषकर प्रकृति से निकटता। पौष और माघ मास की सर्दी के खत्म होते ही प्रकृति भी अपना बसन्त रूपी रंग से उल्लास और उत्साह की तैयारी कर लेती है।फसलों का रंग होली के आने के संकेत के साथ ही हरे से सुनहरे रंग में बदलने लगता है। पतझड़ के बाद वृक्षों में नई पत्तों की कोपलें फ़ुटनें लगती हैं। आम व अन्य फलदार वृक्ष में बौर व पुष्प से प्रकृति में अनेक रंग दिखने लगते हैं। मनुष्य के ठंड का आलस भी होली की साफ सफाई से गायब होने के साथ उनमें नए लक्ष्य व ऊर्जा का संचार होने लगता है।इसलिए ही तो पूर्वजों ने इस त्योहार को रंगों का त्योहार के रूप में मनना शुरू किया। क्योंकि प्रकृति अपने ढंग से आसपास से वातावरण को रंग के नई ऊर्जा व उत्साह का संचार करती है। जिसके साथ ही लोग आपस में मतभेद को भुलाकर नए लक्ष्यों की ओर अग्रसर होते हैं। तो इस होली हम सब भी विरोधाभाषी विचार, असहमति आदि का सम्मान करते हुए एक दूसरे के सहयोग के साथ नई उमंग और ऊर्जा के साथ साथ आगे बढ़े। इसी के साथ इस व्यस्त जीवनशैली में अपने आसपास के लोगों का सुख दुख साझा करने की एक कोशिश तो की ही जा सकती है। आप सभी को नए लक्ष्य व खुशियों रूपी होली के त्योहार की शुभकामनाएं।

 ©आलोक_यादव।

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