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प्राकृतिक होली के आयाम

 एक होली थोड़ी हटकर कृत्रिम हानिकारक रंग से परे, तीव्र ध्वनि वाले संगीत से हटकर थोड़ा सा सोचने पर पूर्वजों के होली मनाने के आशय पर ध्यान देने पर बहुत सी शिक्षा मिलती है विशेषकर प्रकृति से निकटता। पौष और माघ मास की सर्दी के खत्म होते ही प्रकृति भी अपना बसन्त रूपी रंग से उल्लास और उत्साह की तैयारी कर लेती है।फसलों का रंग होली के आने के संकेत के साथ ही हरे से सुनहरे रंग में बदलने लगता है। पतझड़ के बाद वृक्षों में नई पत्तों की कोपलें फ़ुटनें लगती हैं। आम व अन्य फलदार वृक्ष में बौर व पुष्प से प्रकृति में अनेक रंग दिखने लगते हैं। मनुष्य के ठंड का आलस भी होली की साफ सफाई से गायब होने के साथ उनमें नए लक्ष्य व ऊर्जा का संचार होने लगता है।इसलिए ही तो पूर्वजों ने इस त्योहार को रंगों का त्योहार के रूप में मनना शुरू किया। क्योंकि प्रकृति अपने ढंग से आसपास से वातावरण को रंग के नई ऊर्जा व उत्साह का संचार करती है। जिसके साथ ही लोग आपस में मतभेद को भुलाकर नए लक्ष्यों की ओर अग्रसर होते हैं। तो इस होली हम सब भी विरोधाभाषी विचार, असहमति आदि का सम्मान करते हुए एक दूसरे के सहयोग के साथ नई उमंग और ऊर्जा के स...

सिकुड़ते हुए जल स्रोत

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  आजकल तापमान के बढ़ने के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर "शहरी मानवतावादी" लोगों का दिल दरिया हो गया है जिससे प्रत्येक दूसरे पोस्ट या संदेश में छतों पर पंछियों के लिए पानी रखने की गुजारिश की जा रही है। परन्तु ये करने से पहले मन में एक सवाल कौंध जाता है कि, "क्या प्रकृति नें व्यवस्था बनाई थी कि एक दिन पंछियों को अपनी प्यास बुझाने के लिए मनुष्य के द्वारा छतों पर रखे हुए जल पर निर्भर रहना होगा या यह मानव निर्मित समस्या है? मेरा जन्म गाँव मे हुआ , बचपन भी वहीं बीता और गर्मी तो बागों और पोखरों के किनारे। चाहे वो 'बाल मन' हो या तत्कालीन परिस्थिति पर कभी भी पंछियों के पीने हेतु जल की समस्या नहीं दिखी। परंतु समय के साथ बदलती परिस्थितियों में तालाब खेतों में परिवर्तित होते गए या तो अब उनमे जो जल एकत्रित होता है उसका आधुनिक तकनीक के माध्यम से विभिन्न कार्यों हेतु एक या दो माह में दोहन कर दिया जाता है। नदी के जल को बाँध के माध्यम से रोककर उधोग और अपने मनमुताबिक प्रयोग किया जा रहा , जिससे नदियों का बहाव बस नाम मात्र का रह गया है वो भी प्रदूषित स्थिति में। ज्यादातर जलाशय अनि...