सिकुड़ते हुए जल स्रोत

 आजकल तापमान के बढ़ने के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर "शहरी मानवतावादी" लोगों का दिल दरिया हो गया है जिससे प्रत्येक दूसरे पोस्ट या संदेश में छतों पर पंछियों के लिए पानी रखने की गुजारिश की जा रही है। परन्तु ये करने से पहले मन में एक सवाल कौंध जाता है कि, "क्या प्रकृति नें व्यवस्था बनाई थी कि एक दिन पंछियों को अपनी प्यास बुझाने के लिए मनुष्य के द्वारा छतों पर रखे हुए जल पर निर्भर रहना होगा या यह मानव निर्मित समस्या है?

मेरा जन्म गाँव मे हुआ , बचपन भी वहीं बीता और गर्मी तो बागों और पोखरों के किनारे। चाहे वो 'बाल मन' हो या तत्कालीन परिस्थिति पर कभी भी पंछियों के पीने हेतु जल की समस्या नहीं दिखी। परंतु समय के साथ बदलती परिस्थितियों में तालाब खेतों में परिवर्तित होते गए या तो अब उनमे जो जल एकत्रित होता है उसका आधुनिक तकनीक के माध्यम से विभिन्न कार्यों हेतु एक या दो माह में दोहन कर दिया जाता है। नदी के जल को बाँध के माध्यम से रोककर उधोग और अपने मनमुताबिक प्रयोग किया जा रहा , जिससे नदियों का बहाव बस नाम मात्र का रह गया है वो भी प्रदूषित स्थिति में।
ज्यादातर जलाशय अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण की भेंट चढ़ कर अपना वजूद खो चुके हैं। तो कुल मिलाकर वास्तविक स्थिति यह राह गयी है कि किसी व्यक्ति के सारे अंगों और क्षमताओ को खत्म करके व उसके संसाधनों को छीनकर उसे बस सांस लेने भर का भोजन दे दो।
जंगलों में झीलों पर कब्जे, अतिक्रमण से, नदियों के बहाव को मोड़ने से वन्य जीवों की संख्या भी घट रही है। इसके साथ ही वन्यजीव जल की तलाश में रिहायशी इलाकों में प्रवेश कर रहे जिसके कारण जानवर व मनुष्य के बीच संघर्ष भी बढ़ा है।
इस परिस्थिति के लिए हम , आप व सरकार सभी जिम्मेदार हैं एकरूप से। भौतिकतवाद ब दिखावे की संस्कृति के कारण विशेष रूप से शहरी आबादी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही उपयोग नहीं। और फिर ऊपर से मानवतावादी होने का ढोंग भी। दैनिक जीवन में एक ग्रामीण व शहरी क्षेत्र के व्यक्ति द्वारा उपयोग किये जाने वाले जल से आप इसका अंदाज स्वयं लगा सकते हैं। खेती में जो जल की मात्रा प्रयुक्त होती है वह प्रदूषित नहीं होती है उसका जलचक्र के माध्यम से प्रकृति पुनः उपयोग करती है। परंतु शहरों में उपयोग होने वाला जल प्रदूषित हो जाता है विशेष रूप से कारखानों में। इसके अतिरिक्त फटी पाइपलाइन, जल शोधन यंत्रों द्वारा होने वाली बर्बादी, स्विमिंग पूल जैसे शौक़ प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।
अन्त में यही कि "जल है तो कल है"। फिर भी मानवतावादी लोंगो
बधाई
परंतु इसके साथ ही साथ हम सबको जल संरक्षण के मुद्दे पर कार्य करने, सोचने और अपनी आदतों में सुधार की भी आवश्यकता है।
-आलोक यादव।

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